उत्तर प्रदेश फायर विभाग में आपाधापी
अप्रशिक्षित सीएफओ की वर्षों से तैनाती और हेडक्वार्टर के रिटायर्ड बाबू की अघोषित सत्ता
सुनील त्रिपाठी
उत्तर प्रदेश अग्निशमन तथा आपात सेवा विभाग की पूरी कार्यप्रणाली को ही जब आग लग गयी हो तो उसे काबू में भला कौन करे? इस विभाग की रामभरोसे कारगुजारियों के चलते सामान्य नागरिकों की अग्निकांडों से सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित हो रही है, इसकी कल्पना भी सहज ही की जा सकती है। इस विभाग में छोटे-बड़े कर्मचारियों/अधिकारियों की तैनाती और तबादलों में अन्य विभागों की तरह छीना-झपटी भी चलती ही रहती है, लेकिन लगभग सभी जनपदों में नियुक्त अग्निशमन अधिकारियों द्वारा सभी श्रेणी की बहुमंजिली इमारतों को एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) तथा कम्प्लीशन सर्टिफिकेट जारी किए जा रहे हैं और उसमें एनबीसी (National Building Code) तथा उत्तर प्रदेश अग्नि तथा आपात सेवा अधिनियम एवं नियमावली की जिस प्रकार धज्जियाँ उड़ायी जा रही हैं, ये किसी भी जागरूक नागरिक का माथा चकरा देने के लिए पर्याप्त है।
इस प्रकरण में इस संवाददाता द्वारा विभागीय उच्चाधिकारियों से विगत चार माह में विस्तृत पत्राचार किया गया, जो दर्जनों पृष्ठों में है, लेकिन मिले ढाक के तीन पात ही! विभाग में महानिदेशक आते-जाते रहे और प्रभारी सहर्ष अतिरिक्त कार्यभार संभालते रहे, नतीजन जनपदों में नियुक्त अग्निशमन अधिकारियों की मनमानी चलती जा रही है।
चौंकाने वाले हालात यह हैं कि गाजियाबाद सहित आधा दर्जन जिलों के सीएफओ (मुख्य अग्निशमन अधिकारी) को आधारभूत प्रशिक्षण तक प्राप्त नहीं हुआ है और वे लगभग आठ-आठ वर्षों का कार्यकाल भी पूरा कर चुके हैं। हालांकि इस संवाददाता द्वारा अपने पत्राचार में विभाग व शासन के उच्चाधिकारियों को बार-बार यह बताया गया कि किसी भी न्यूज रिपोर्टर की सबसे बड़ी लालसा या लालच एक्सक्लूसिव स्टोरी प्रकाशित करने की होती है, तथापि उसने शासन-प्रशासन की छवि को बट्टा लगाने से गुरेज बरतने का प्रयास किया और अंत में दंडात्मक और सुधारात्मक कदम न उठाए जाने पर सक्षम न्यायालय में गुहार लगाने की भी सूचना दी, पर क्या करें, नक्कारखाने में तूती की आवाज न कभी सुनी गयी और न कभी सुनी ही जाएगी।
इसलिए विवश होकर इस विभाग के कार्यकलापों का विस्तृत व साक्ष्यों सहित विवरण कई कड़ियों में प्रकाशित किया जा रहा है...
उत्तर प्रदेश अग्निशमन तथा आपात सेवा विभाग में मची आपाधापी तथा भ्रष्टाचार को लेकर प्रकाशित हो रही इस प्रथम कड़ी में अनेकों जनपदों में तैनात मुख्य अग्निशमन अधिकारियों के बारे में बताया जा रहा है, जिन्हें अनिवार्य रूप से जिस प्रशिक्षण को प्राप्त करना था, वह उन सभी द्वारा आज तक प्राप्त ही नहीं किया गया है और वे सभी लगभग आधा दर्जन जिलों में कई-कई वर्षों से मुख्य अग्निशमन अधिकारी के पदों पर नियुक्त हैं।
जनपदों में तैनात मुख्य अग्निशमन अधिकारियों में गाजियाबाद तथा गौतमबुद्धनगर जैसे वे महत्वपूर्ण जनपद भी शामिल हैं, जहाँ बहुमंजिले आवासीय व व्यावसायिक इमारतों के साथ-साथ संस्थागत तथा औद्योगिक संस्थानों की बाढ़ सी आई हुई है। केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार के प्रतिष्ठित संस्थान भी इन्हीं जनपदों में स्थापित हैं।
इन दोनों जिलों में तैनात दोनों मुख्य अग्निशमन अधिकारी क्रमशः राहुल पाल तथा प्रदीप कुमार चौबे पर तो मानो शासन की स्थानांतरण नीति ही लागू नहीं होती है। दोनों इन्हीं मलाईदार जिलों में जमे हुए हैं। इनकी मनमानी कार्यप्रणाली पर किसी का अंकुश नहीं है।
विभागीय महानिदेशक आते रहे और जाते रहे, लेकिन उन्होंने इस विभाग की कार्यप्रणाली के सुधार हेतु कोई प्रयास नहीं किए। कुछ वर्ष पूर्व महानिदेशक अविनाश चन्द्रा के जाने के बाद पुलिस मुख्यालय लखनऊ में ही तैनात अपर महानिदेशक, महिला एवं बाल सुरक्षा पद्मजा चौहान को महानिदेशक का प्रभार दे दिया गया, जो उनके पास 6-7 माह तक रहा और इसका उन्होंने ‘पूरी तत्परता’ से निर्वहन किया।
उनकी इस तत्परता के चलते इसी विभाग से वर्ष 2023 में गोपनीय सहायक के पद से रिटायर होकर संविदा पर तैनाती मैनेज कर लेने वाले सैय्यद मोहम्मद अली की भूमिका भी अतिमहत्वपूर्ण रही।
सामान्य तौर पर यदि किसी व्यक्ति को अथवा व्यक्तियों को किसी सरकारी विभाग में संविदा पर नियुक्त किया जाना होता है तो उसकी भी एक प्रक्रिया होती है। मनमाने तरीके से चुनिंदा व्यक्ति या महिला को किसी पद या कार्य विशेष के लिए यूँ ही नियुक्ति दे दी जाती है, ऐसा नहीं होता।
वैसे भी मुख्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार वहाँ पहले से कई गोपनीय सहायक उपलब्ध हैं। ऐसे में उनमें किसी को भी वरिष्ठता के हिसाब से महानिदेशक का गोपनीय सहायक नियुक्त किया जा सकता था। वैसे भी यह सामान्य ज्ञान की बात है कि जिस व्यक्ति अथवा महिला की अवकाश प्राप्ति के बाद उसी विभाग या उसी पद पर संविदा कर्मी के रूप में नियुक्ति होती या वह नियुक्ति ‘हासिल’ कर लेता है तो उसकी विभाग व शासन के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धताओं का क्षरण हो जाता है।
अब यहाँ तो मामला राज्य के एक विभागीय मुखिया के कार्यालय का है, जहाँ शासकीय ज्ञापनों से लेकर स्थापना से जुड़े अनेकों गोपनीय कार्यकलापों व दस्तावेजों का आदान-प्रदान होता है। विभाग के छोटे से छोटे कर्मचारियों से लेकर राजपत्रित अधिकारियों तक की नियुक्तियाँ हों, उनकी अलग-अलग जनपदों में तैनाती हो, उनके विरुद्ध किसी कदाचार या भ्रष्टाचार की शिकायत के फलस्वरूप अमल में लायी जाने वाली अनुशासनात्मक कार्यवाहियाँ हों, सभी आदेश/निर्देश इसी कार्यालय से निर्गत होते हैं।
इसी से महानिदेशक अग्निशमन तथा आपात सेवा के कार्यालय में तैनात गोपनीय सहायक की भूमिका की महत्ता को समझा जा सकता है। इसलिए यदि वास्तव में गोपनीय सहायकों की मुख्यालय में कमी भी थी और हर हालात में गोपनीय सहायक के पद पर सैय्यद मोहम्मद अली की ही सेवाएँ संविदा पर ही सही, लेकिन शासन और जनहित में आवश्यक थीं तो उन्हें महानिदेशक कार्यालय के स्थान पर किसी अन्य अधिकारी के साथ संबद्ध किया जा सकता था।
ऐसा आभास होता है कि इस कर्मचारी में कुछ सुर्खाब के पर अवश्य ही लगे होंगे, जो कि 2023 से लेकर मई 2026 तक डीजी फायर के कार्यालय में गोपनीय सहायक जैसे संवेदनशील पद पर संविदा कर्मी के रूप में काम करते रहने में कामयाब रहा।
गौरतलब है कि फिलहाल सैय्यद मोहम्मद अली संविदा कर्मी के रूप में भी तैनात नहीं है, लेकिन आपका चौंकना अभी बाकी है। बीच में यह भी बताना जरूरी है कि पिछले महानिदेशक सुजीत पाण्डेय के कार्यकाल (फरवरी-2026 से जून-2026) के दौरान ही इन सज्जन का संविदा कार्यकाल पूरा हो गया था। उन्हें किसी ने हटाया भी नहीं था, हाँ, संविदा कर्मी के रूप में नियुक्ति का सेवा विस्तार उन्हें ‘दुर्भाग्यवश’ प्राप्त नहीं हो सका।
लेकिन संविदा का समय समाप्त होने के बाद भी सैय्यद मोहम्मद अली अपने घर नहीं बैठे। वह निरंतर पुलिस मुख्यालय एडीजी, महिला एवं बाल कल्याण के कार्यालय में आकर ‘ड्यूटी’ देते रहे। अब मुख्यालय में किसकी अनुमति से रिटायर्ड व्यक्ति को नियमित प्रवेश मिलता रहा, ये तो मुख्यालय के मुख्य सिक्योरिटी अफसर ही बता सकते हैं।
लेकिन 30 जून 2026 को पूर्व महानिदेशक के हटते ही इस पद का प्रभार पुनः पुलिस मुख्यालय में ही तैनात अपर महानिदेशक पुलिस पद्मजा चौहान को मिल गया। ऐसे में जाहिर है कि सैय्यद मोहम्मद अली फिर से अलादीन के चिराग के आका बन बैठे।
एडीजी पुलिस महोदया के डीजी फायर का प्रभार संभालते ही नियमित महानिदेशक की तरह उन्होंने मुख्यालय के विभागीय अधिकारियों व सहायकों के तैनाती स्थलों में भारी उलटफेर कर डाला, जिसने गैर-विभागीय कर्मचारियों तक को आश्चर्य में डाल दिया। क्योंकि इतनी तत्परता तो उन्होंने अपने मूल नियुक्ति पद पर रहते हुए भी नहीं निभाई।
इतना ही नहीं, सैय्यद मोहम्मद अली श्रीमती पद्मजा चौहान के आधिकारिक भ्रमण व विभागीय समीक्षा हेतु हुए दौरों पर भी जाने लगा। उदाहरण के दौरान दिनांक 21 जुलाई 2026 को मथुरा जनपद के गोवर्धन में मुड़िया मेले के आयोजन हेतु तैयारियों की समीक्षा के लिए एडीजी वहाँ पहुँचीं, जिसमें जिले के पुलिस अधीक्षक सहित पुलिस व फायर विभाग के अधिकारी भी मौजूद थे।
लेकिन यहाँ भी उनकी इस बैठक में सैय्यद मोहम्मद अली बैठे ही नजर नहीं आ रहे हैं, बल्कि वह कार्यवाही के नोट्स भी तैयार कर रहे थे। यही नहीं, एडीजी महोदया के गाजियाबाद में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में कांवड़ यात्रा की तैयारियों की समीक्षा के लिए 22 जुलाई को वहाँ पहुँचने पर वैशाली सीएफओ कार्यालय में आयोजित बैठक में भी सैय्यद मोहम्मद अली शामिल रहे।
यहाँ पुनः स्मरण कर लें कि सैय्यद मोहम्मद अली नाम के ये सज्जन न तो पूर्णकालिक कर्मचारी हैं और न ही अब संविदाकर्मी ही हैं। ऐसे में किस हैसियत से वह लखनऊ मुख्यालय से बाहर आयोजित होने वाली उन सभी बैठकों में हेकड़ी के साथ शामिल हो रहे हैं? बल्कि अपुष्ट सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि उन्होंने बैठक में शामिल सभी जिलों के सीएफओ को हड़काया भी है।
इस प्रकार कुर्सी पर रहते हुए भी और कुर्सी से हटने के बाद भी इस व्यक्ति की जनपदों में तैनात विभागीय अधिकारियों पर हनक आज भी बरकरार है।
अलग-अलग जनपदों में जो अप्रशिक्षित सीएफओ तैनाती बनाए रखने में कामयाब रहे हैं, उनके नाम एवं तैनाती स्थल इस प्रकार हैं—
1. मुकेश कुमार, जनपद अलीगढ़
2. राहुल पाल, गाजियाबाद
3. आनंद सिंह राजपूत, वाराणसी
4. प्रदीप कुमार चौबे, गौतमबुद्धनगर
5. मनु शर्मा, बरेली
6. प्रतीक श्रीवास्तव, कानपुर देहात
इनमें से गाजियाबाद तथा अलीगढ़ के सीएफओ की नियुक्ति वर्ष 2018 है, अर्थात इन दोनों को उक्त पद पर तैनाती पाए लगभग 8 वर्ष होने जा रहे हैं, लेकिन इन्होंने अभी तक अनिवार्य आधारभूत प्रशिक्षण तक प्राप्त नहीं किया है।
इसी प्रकार गौतमबुद्धनगर, वाराणसी एवं कानपुर देहात के सीएफओ का नियुक्ति वर्ष 2017 है, लेकिन यहाँ नियुक्त ये तीनों सीएफओ भी लगभग 9 वर्षों से बिना अनिवार्य प्रशिक्षण के ही अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।
यही नहीं, बरेली जनपद में नियुक्त सीएफओ मनु शर्मा की नियुक्ति तिथि तो 26 सितम्बर 2014 है। अर्थात ये महोदय अप्रशिक्षित होते हुए भी विगत लगभग 12 वर्षों से अपने पद पर निरंतर कार्यरत हैं।
अप्रशिक्षित सीएफओ के वर्षों तक अपने-अपने जनपदों में निरंतरता के साथ नियुक्त होने की जानकारी किसी स्रोत अथवा बिना साक्ष्य के यहाँ नहीं बतायी जा रही है। इस तथ्य की पुष्टि तो उत्तर प्रदेश अग्निशमन तथा आपात सेवा विभाग का प्रभार संभालने वाली अपर पुलिस महानिदेशक पद्मजा चौहान द्वारा राज्य के पुलिस महानिदेशक को प्रेषित पत्र से ही हो रही है।
उनके द्वारा यह संख्या एफ.एस/1104-2023 दिनांक 10.08.2026 है, जिसे यहाँ प्रकाशित भी किया जा रहा है। इस पत्र से इस तथ्य का भी उद्घाटन हो रहा है कि इनके प्रशिक्षण की बाबत उत्तर प्रदेश महानिदेशक पुलिस को फायर महानिदेशालय द्वारा एक पत्र दिनांक 18 नवम्बर 2025 को भी प्रेषित किया गया था।
इन सभी सीएफओ को अलग श्रेणी में कुल 12 माह का प्रशिक्षण प्राप्त करना होता है, जिसमें से 3 माह का ‘आधारभूत’ प्रशिक्षण भी अनिवार्य है। दिलचस्प तथ्य यह है कि उपरोक्त प्रकरण को शासन की याचिका समिति में भी उठाया जा चुका है तथा जहाँ सचिव गृह, उत्तर प्रदेश शासन ने भी इस प्रशिक्षण को इन सभी सीएफओ को प्रदान कराये जाने का आश्वासन दिया था।
अब ऐसा प्रतीत होता है कि ये पत्राचार आदि मात्र एक औपचारिकता है और इस मामले को किसी भी स्तर पर गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।
नवनियुक्त विभाग में पदोन्नति प्राप्त कर एवं सीएफओ नियुक्त होने वालों के आवश्यक एक वर्ष प्रशिक्षण हेतु कल्याणपुर, कानपुर जनपद विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित सदस्या श्रीमती नीलिमा कटियार ने अपर मुख्य सचिव गृह, उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ को प्रेषित पत्र द्वारा अपनी चिंता जतायी है।
उन्होंने लिखा है कि उत्तर प्रदेश अग्निशमन तथा आपात सेवा नियमावली के अंतर्गत नियम 70(1) में नव नियुक्त राजपत्रित अधिकारियों (सीएफओ) को कुल एक वर्ष का आधारभूत प्रशिक्षण कराये जाने का प्रावधान किया गया है तथा विभाग के अराजपत्रित कैडर से राजपत्रित कैडर में पदोन्नत हुए अधिकारियों को ढाई वर्ष बीतने के बाद भी अनिवार्य एक वर्ष का प्रशिक्षण प्रदान नहीं कराया गया।
उन्होंने चिंता जाहिर करते हुए लिखा है कि अनिवार्य प्रशिक्षण के अभाव में ये अधिकारी गुणवत्तापूर्ण, बेहतर व उच्च कोटि का अग्निशमन, रेस्क्यू तथा आपात प्रबंधन आदि का पर्यवेक्षण नहीं कर पाएंगे।
अब जहाँ तक प्रश्न माननीया विधायक की पदोन्नत सीएफओ के अनिवार्य प्रशिक्षण के प्रावधानों को लागू करने को लेकर आग्रह का है, वह नितान्त रूप से जायज है। लेकिन यहाँ प्रकाशित किये जा रहे उनके पत्र से उन तथ्यों की भी पुष्टि हो जाती है कि 8 वर्षों से लेकर 12 वर्षों तक सीएफओ पद पर नियुक्त अधिकारी बिना अनिवार्य प्रशिक्षण के निरंतर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।
जबकि विभाग में पदोन्नत सीएफओ को अपने अनुभव के अनुसार अग्निशमन एवं आपात सेवाओं को देने का कम से कम कुछ तो प्रशिक्षण प्राप्त है। यही नहीं, उन्हें पदोन्नत होकर नियुक्त हुए 2 वर्ष 6 माह ही हुए हैं और अपर महानिदेशक पद्मजा चौहान द्वारा महानिदेशक, पुलिस, उत्तर प्रदेश को प्रेषित पत्र में जिन 6 सीएफओ का विवरण दिया गया है, उनमें से तीन को सीएफओ पद पर सीधे नियुक्त हुए 9 वर्ष, दो को नियुक्त हुए 8 वर्ष तथा एक को नियुक्त हुए 12 वर्ष हो गए हैं, लेकिन इनको भी अनिवार्य प्रशिक्षण दिये जाने की कोई संभावना फिलहाल तो दिखाई नहीं दे रही है।
इस विभाग में जारी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के अनेक कारणों में एक प्रमुख कारण विभाग में नियुक्त होने वाले मुखिया अर्थात महानिदेशकों की भूमिका के योगदान का भी है। एक-दो वर्ष की अवधि के लिए नियुक्त होने वाले महानिदेशकों ने इस पद पर केवल अपना समय व्यतीत किया, कुछ ने तदर्थवाद की नीति को अपनाया, आवश्यक विभागीय जानकारी के अभाव में ‘निजी स्टाफ’ की कार्यशैली को उनकी अनुशंसा मानकर काम किया और फाइलों का निस्तारण किया।
महानिदेशक अविनाश चन्द्रा के बाद यह पद 6-7 माह तक रिक्त रहा। एडीजी महिला एवं बाल कल्याण ही अतिरिक्त चार्ज के रूप में इस विभाग को ‘पूर्णकालिक’ महानिदेशक के रूप में चलाती रहीं।
माह फरवरी, 2026 में महानिदेशक के रूप में सुजीत पाण्डेय की नियुक्ति हुई। ऐसा लगा अब शायद यह पूर्णकालिक महानिदेशक अपना शेष 2 वर्षों का सेवाकाल इसी पद पर पूरा करेंगे और कुछ सकारात्मक एवं सुधारात्मक काम करेंगे।
हालांकि उनकी कार्यशैली भी इस अल्पकाल में कैसी रही, जिसके परिस्थितिजन्य साक्ष्य अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह को इसी संवाददाता द्वारा प्रेषित किये जा चुके हैं। हालांकि सुजीत पाण्डेय हैदराबाद चले गये।
एडीजी पद्मजा चौहान ने पदभार संभालते ही मात्र एक माह की इस अवधि में बिजली की गति से काम करके विभाग के अधिकारियों को हिला दिया।
लेकिन शासन ने अपने हैट से एक और कबूतर उस समय निकाल दिया, जब इस विभाग के महानिदेशक पद पर मुथा अशोक जैन को लाकर बैठा दिया, जिनका कार्यकाल ही कुल एक माह का शेष था। वह अपने पद से 31 अगस्त 2026 अर्थात इसी माह के अंत में रिटायर हो जायेंगे।
उनकी या किसी भी अन्य अधिकारी को एक माह के लिए इस महत्वपूर्ण संवेदनशील पद पर नियुक्ति किये जाने का औचित्य किसी भी जागरूक नागरिक के समझ में नहीं आ सकता। यही वह महत्वपूर्ण कारण है कि इस विभाग में जनपद स्तर पर अफरातफरी का दौर जारी है और पूर्णकालिक ईमानदार डीजी के अभाव में यही दस्तूर चलता भी रहेगा।
विभागीय अफरातफरी और कथित भ्रष्टाचार की एक ताजा-तरीन मिसाल नोएडा के सेक्टर 62 में स्थित 134 मीटर ऊँची ‘दि कोरंथम’ (The Corenthum) नामक व्यावसायिक इमारत है, जिसे मानकों को धता बताते हुए पहले तो दिसम्बर 2022 में भी वर्ष पूर्णता प्रमाण पत्र उपलब्ध करा दिया गया तथा इसी वर्ष 2026 में भी 2022 से ही मौजूद संरचनात्मक कमियों के बावजूद इस भवन के पूर्णता प्रमाण पत्र का नवीनीकरण पत्र भी कोरंथम के मालिकों को मैनेज करा दिया गया।
इसका सम्पूर्ण विवरण अगले अंक में विस्तार से प्रकाशित किया जायेगा।
(दी कोरंथम प्रकरण अगले अंक में)